सुन्दरता सामन्जस्य मे होती है. सारे मानव समाज को सुन्दर बनाने की साधना का ही नाम साहित्य है.... जो जाति जितनी ही अधिक सौन्दर्य प्रेमी है, उसमे मनुष्यता उतनी ही अधिक होती है, किसी जाति के उत्कर्ष व अपकर्ष का पता उसके साहित्य से चलता है.---डा.हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

रविवार, 4 जुलाई 2010

शमा

कौन देता है साथ गम की रात का । 

शमा भी अखिर तन्हा जलती है रात भर ॥

शनिवार, 3 जुलाई 2010

रोना

आज़ उनके बज़्म में तूफ़ान उठाकर उठे । 

इस तलक रोये कि उनको भी रुलाकर उठे ॥

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

असर


गज़ल में बन्दिश-ए-अलफ़ाज़ ही नही काफ़ी ।

ज़िगर का खून भी चाहिये असर के लिये ॥

हुस्न और नज़ाकत

खुदा जब हुस्न देता है तो नज़ाकत आ हि जाती है ।

कितना ही सम्भल के चलो कमर बल खा ही जाती है ॥

इन्तजार


कुछ रोज़ ये भी रंग रहा इन्तजार का । 

आंखें उठ गईं जिधर, बस उधर ही देखते रहे॥

इन्तज़ार


न कोई वादा, न कोई यकीं न कोई उम्मीद । 

मगर हमें तो तेरा इन्तज़ार करना था ॥

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

हीरे

हीरे तो कम नहीं हैं मेरे शहर मे मगर ।

आन्खें परखने वालों की कमज़ोर हो गई ॥

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अभी तलाश मे हूं कि . . . . मैं कौन हूं ? ? ?