सुन्दरता सामन्जस्य मे होती है. सारे मानव समाज को सुन्दर बनाने की साधना का ही नाम साहित्य है.... जो जाति जितनी ही अधिक सौन्दर्य प्रेमी है, उसमे मनुष्यता उतनी ही अधिक होती है, किसी जाति के उत्कर्ष व अपकर्ष का पता उसके साहित्य से चलता है.---डा.हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
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बुधवार, 25 अगस्त 2010

अजनबी

ये बेजान चीजें, ये उनकी नुमाइश, ये गुन्चे, ये कलियां, ये तारे, हटा दो ।

जहां से गुज़रना है, उस अजनबी को,वहां मेरे दिल की धडकन बिछा दो ॥

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

परवाना

मिसाले परवाना तुम एक पल में न जलना सीखो ।

ता सहर शमा की मानिन्द पिघलना सीखो ॥

सोमवार, 16 अगस्त 2010

तेरी मुस्कुराहट

शामिल नहीं है जिसमे तेरी मुस्कुराहटें,

वो जिन्दगी किसी जहन्नुम से कम नही ।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

शनिवार, 31 जुलाई 2010

अदा

ये कैसी अदा ,ये कैसा सितम, जाने वो क्यूं दिल को तडपाता है । 

महफ़िल मे वो हमसे बात करे, और तन्हाइ मे शरमाता है ॥

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

वहम

क्या क्या ख्याल-ओ-वहम निगाहों पे छा गये । 

जी धक से हो गया, ये सुना जब वो आ गये ॥

शनिवार, 24 जुलाई 2010

दर्द

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी । 

सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी ॥

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

शाम

शाम होते ही चरागों को बुझा देता हुं ।

दिल ही काफ़ी है तेरी याद में जलने के लिये ॥

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बुधवार, 21 जुलाई 2010

जवानी

जवानी जा चुकी लेकिन,

         खलिश दर्दे मोहब्बत की । 

वहीं महसूस होती है, 

          जहां महसूस होती थी ॥

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

जवानी

दिल कई धडकन जहां बेबाक हुआ करती है,

रंग मे डूबी हुइ हर रात हुआ करती है । 

नींद लगते ही ख्वाब गुलाबी आना, 

ये जवानी की शुरुआत हुआ करती है ॥


सोमवार, 19 जुलाई 2010

रातें

किस्मत मे ना थी ये दो रातें, 

एक प्यार की एक तन्हाई की ।

एक रात मे जीना आ जाता, 

एक रात मे मरना आ जाता ॥

रविवार, 18 जुलाई 2010

शमा की कसम

शमा ने आग रखी सर पे , कसम खाने को । 

कि बाखुदा , मैने नही जलाया परवाने को ॥

शनिवार, 17 जुलाई 2010

तिल

अब समझा मै तेरे रुख्सार पे तिल का मतलब । 

दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है ॥

रविवार, 11 जुलाई 2010

तन्हा

वहां क्यूं जाऊं मै कोइ जहां अपना नही लगता ।
तुम्हारे बज़्म में तो गैर भी तन्हा नही लगता ॥

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

तबस्सुम

आखिर जब उनको मेरी वफ़ा पे एतबार आया । 

लब-ए-नाज़ुक पे हल्का सा तबस्सुम बार बार आया ॥

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

अंदाज़

जिसे मै प्यार का अन्दाज़ समझ बैठा हूं । 

वो तबस्सुम वो तकल्लुफ़ तेरी आदत ही न हो ॥

बुधवार, 7 जुलाई 2010

इन्तजार

राह उनकी तकते-तकते मुद्दत गुजर गई ।

आंखों में हौसला न रहा इंतजार का ॥

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

सोमवार, 5 जुलाई 2010

बिज़ली

होशोहवास पर मेरे बिजली सी गिर गई,
मस्ती भरी आन्खों से पिलाते चले गये ।
जो सांस आ रही है उसी का पयाम है,
बेताबियों को और बढाते चले गये ॥

मेरे बारे में

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अभी तलाश मे हूं कि . . . . मैं कौन हूं ? ? ?